Monday, March 31, 2008

चालीस रुपये किलो हुआ पोदीना, पचास फीसदी महंगी हुई थाली

Apr 01, 02:15 am
बरेली। बढ़ती महंगाई ने जिंदगी के सफर को मुश्किल कर दिया है। महिलाओं की चौपाल हो, गली का चौराहा या तमाम सुविधाओं से सुसज्जित आफिस। हर तरफ कुछ समय महंगाई के असर पर चरचा में गुजर रहा है। जाहिर है कि अब इस महंगाई ने लोगों को तेजी से प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
समय के साथ कहावत का मतलब भी बदलना पड़ जाता है। क्या आज कोई किसी को कह सकता है-मेरे सामने क्या पोदीना बेचते हो? जनाब पोदीना चालीस रुपये किलो मिल रहा बाजार में। महंगाई ने कमर नहीं मानो आम आदमी की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी है। घर की थाली पचास फीसदी तक महंगी हो चुकी है। निम्न तबके में कुपोषण और भी बढ़ रहा है। मध्यम वर्ग के खाने की क्वालिटी भी दिन ब दिन घट रही है। दूध, दही और फल अब अमीरों या फिर मध्यवर्ग में बहुत छोटे बच्चों के लिए रह गये मालूम पड़ते हैं।
चंद साल ही हुए जब 15 हजार रुपये वेतन पाने वाला 'लग्जीरियस' जिंदगी जी रहा था अब उतना ही वेतन पाने वाला जिंदगी गुजार रहा है। क्या इतना वेतन पाने वाला घर बनाने का सपना देख सकता है.शायद नहीं.। उसके सामने तमाम दुश्वारियां, चिंताएं हैं। बेटी की शादी कैसे होगी..बेटे को इंजीनियरिंग में दाखिला कैसे दिला पाएंगे। चिंता की वजह जायज है क्योंकि बढ़ती महंगाई ने वेतन को सिर्फ खाने पीने तक ही सीमित कर दिया है वह भी बहुत अच्छा नहीं। पहले जहां महंगाई का असर सालों में दिखती थी वहीं अब सप्ताह में महंगाई के आंकड़े देखे जा सकते हैं। खाद्य तेल हो या आटा-चावल, फल हो या सब्जी यहां तक की दूध भी अब 24 रुपये किलो तक बिक रहा है। अब तो बस सभी की जुबान पर एक ही दुआ है..महंगाई कम हो।
आसमान छूती महंगाई
उत्पाद मूल्य सिंतबर 07 मार्च 08
खाद्य तेल 55-60 70
आटा 13-15 13-15
दाल :-
मसूर 35-40 40-45
उड़द 25-32 32-38
चना 28-32 35-38
मलका 35-40 42-45
सब्जी :-
तोरई 20-30 30-32
करेला 25 30-40
लहसुन 20 30
परवल 22-25 32
लौकी 6-7 10-12
हरा धनिया 12 40
खीरा 8 14
पोदीना 20 40
फल :-
सेब 45 60
अनार 35-40 50
अंगूर 25 40
संतरा 25 40
केला 15 25
मांस :-
चिकन 60-70 90
मटन 130-140 160-170
मछली 130-170 150-200
चाय :-
ब्रांडेड चाय 95-150 110-160
खुली चाय 60-70 100
दूध 18-20 22-25

साभार जागरण पोर्टल

ग्रेजुएशन: अब सिर्फ किताबी ज्ञान से नहीं चलेगा काम

Apr 01, 02:15 am
बरेली। ग्रेजुएशन में अब सिर्फ किताबी ज्ञान से काम नहीं चलेगा। इसके लिए छात्र-छात्राओं को अतिरिक्त पढ़ाई भी करनी होगी। प्रदेश सरकार के आदेश पर पर्यावरण व शारीरिक शिक्षा को अनिवार्य करने के बाद अब विवि प्रशासन पाठ्यक्रम में तीन और विषय शामिल करने जा रहा है। मानवाधिकार, सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय गौरव। खास बात यह है कि छात्र को पास होने के लिए मुख्य विषयों के साथ-साथ इन पांच विषयों की परीक्षा भी अनिवार्य रूप से पास करनी होगी। कुलपति ने तीन नये विषयों का पाठ्यक्रम तय करने के लिए 12 सदस्यीय कमेटी का गठन किया है। समिति को 25 अप्रैल को विवि में होने जा रही बैठक में अपनी सिफारिशें रखनी होंगी।
प्रदेश सरकार ने पिछले सत्र में प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों को पर्यावरण व शारीरिक शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू करने के आदेश दिये गये थे। विश्वविद्यालयों ने दोनों विषयों को क्वालीफाइंग पेपर के रूप में शामिल कर लिया था। अब शासन ने तीन और विषयों को स्नातक कक्षाओं में अनिवार्य रूप से लागू करने को कहा है। सांप्रदायिक सौहार्द, राष्ट्रीय गौरव व मानवाधिकार भी अगले सत्र से पाठ्यक्रम में शामिल हो जायेंगे। खास बात यह है कि इसके लिए विवि का कालेज में अलग से पढ़ाई नहीं करवाई जायेगी। छात्र को खुद ही इन विषयों को तैयार करना होगा, अंकतालिका पर इनके नंबर भी नहीं चढ़ाये जायेंगे, लेकिन फेल होने पर छात्र को अंकतालिका नहीं दी जायेगी। तीनों ंिवषयों का पाठ्यक्रम तय करने के लिए कुलपति प्रो. ओमप्रकाश ने 12 सदस्यीय कमेटी का गठन किया है।
कमेटी के सदस्य व हिंदू कालेज के प्राचार्य डा. एसएन सिंह ने बताया: विवि ने ये तीन पाठ्यक्रम सरकार और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर शुरू किये हैं। हमने विवि प्रशासन को पांचों विषयों का एक ही पेपर कराने का सुझाव दिया है। सौ नंबर के इस प्रश्नपत्र में सभी विषयों के बीस-बीस सवाल होंगे। सभी सवाल बहुविकल्पीय होगे। इसमें छात्र को ओएमआर शीट दी जायेगी। सभी विषयों का पाठ्यक्रम 25 अप्रैल को विवि में होने जा रही बैठक में तय किया जायेगा। साभार जागरण पोर्टल

Sunday, March 30, 2008

अब आसान नहीं होगा बीएड कालेज खोलना

बरेली। प्रदेश में तेजी से खुल रहे बीएड कालेजों पर शासन ने लगाम कस दी है। अब किसी भी कालेज को पांच साल से पहले बीएड चलाने की अनुमति नहीं दी जायेगी। इसके साथ ही एकल बीएड कालेज खोलने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है।

प्रदेश के सभी लॉ कालेजों को लखनऊ स्थित डा. राममनोहर लोहिया विधि विश्वविद्यालय से जोड़ने के फैसले के बाद शासन ने बीएड कालेजों पर भी लगाम कस दी है। युवाओं में एजुकेशन के क्रेज को देखते हुए इस समय बड़ी संख्या में बीएड कालेज खुल रहे हैं। अकेले रुहेलखंड विवि परिक्षेत्र में इस समय 41 बीएड कालेज हैै।

तेजी से खुल रहे निजी बीएड कालेजों व कालेज प्रबंधनों से छात्रों के उत्पीड़न की तमाम शिकायतें मिलने के बाद शासन ने इन कालेजों की मान्यता के लिए कड़े दिशा निर्देश जारी कर दिये हैं। अब बीएड की मान्यता लेने से पहले किसी भी कालेज को बीएससी, एमएससी व बीकॉम में से किसी दो में दो बैच पास आउट करवाना जरूरी होगा। यानि कालेज को बीएससी-बीकॉम, बीए-बीकॉम व बीए-बीएससी में पांच साल अनिवार्य रूप से पढ़ाई करवानी होगी। पांच साल से पहले शासन किसी भी कालेज को एनओसी नहीं देगा। शासन ने एकल बीएड कालेज खोलने पर भी रोक लगा दी है। रुहेलखंड विवि के संबद्धता अधीक्षक एससी मित्तल ने बताया: ऐसा आदेश पिछली सरकार में भी जारी किया गया था, इस सरकार ने इसमें कुछ संशोधन करते हुए इसे सख्ती से लागू करने के आदेश दिये हैं। साभार जागरण पोर्टल.

डाक्टरों और रामदेव में कोई झगड़ा नहीं

Mar 29, 02:29 am
बरेली। योग गुरू बाबा रामदेव आज देसी और विदेशी चिकित्सा पद्धति के झगडे़ को खत्म करने के मूड में नजर आये। रुहेलखंड मेडिकल कालेज का उद्घाटन करने आये बाबा रामदेव ने भावी डाक्टरों की एक घंटे क्लास ली और योग के फंडे समझाए। उन्होंने कहा कि स्वस्थ्य समाज की स्थापना के लिये देसी और विदेशी चिकित्सा पद्धतियों का मिलन होना चाहिए।
हजारों छात्रों और अतिथियों से भरे पंडाल में बाबा रामदेव ने जैसे ही बोलना शुरू किया शांति छा गई। चिकित्सा विज्ञान के मूल तत्वों का विश्लेषण करते हुए स्वामी जी ने जहां विदेशी चिकित्सा पद्धति की उपयोगिता को बताया, वहीं बड़ी साफगोई से यह सिद्ध करने की कोशिश की कि योग इन सबमें ऊपर है। उन्होंने कहा कि सभ्य समाज अब इस तथ्य को स्वीकार कर रहा है कि डाक्टर और रामदेव एक दूसरे के विरोधी नहीं।
प्रारंभिक रोकथाम को चिकित्सा विज्ञान का पहला तत्व बताते हुए स्वामी रामदेव ने कहा कि बीमारियां न हों इसको रोकने का उपाय मेडिकल साइंस में नहीं। पोलियो जैसी बीमारी से बचाव के लिये जरूर दवा खोजी गई है। जबकि प्राणायाम सही ढंग से करने वाला निरोगी रहता है यह साबित हो चुका है।
सेकेंडरी प्रीवेंशन पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि विदेशी चिकित्सा में कैंसर सरीखे रोगों को दोबारा होने से नहीं रोका जा सकता लेकिन योग से कैंसर को क्योर किया जा सकता है। स्वामी जी ने कहा कि रोगों के एक्यूट मैनेजमेंट में एलोपैथी का कोई तोड़ नहीं, और न ही उसको लेकर कोई मतभेद है। जीवन रक्षा प्रणाली में माडर्न मेडिसिन बेस्ट है, लेकिन यह पद्धति मर्ज को मेंटेन करती है जबकि योग क्योर करता है।
दो करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष रूप से योग की शिक्षा देने का दावा करते हुए स्वामी जी ने कहा कि मैंने योग में कुछ नया नहीं किया, बल्कि प्रयोग किया और उसके परिणाम सामने आते गये जो प्रमाण हो गये। तनाव को सभी बीमारियों का कारण बताते हुए स्वामी रामदेव ने बताया कि एसजीपीजीआई लखनऊ केसाथ मिलकर उन्होंने शोध किया। नौ दिनों तक चले इस शोध में पाया गया कि योग से तनाव पैदा करने वाले हारमोन्स खत्म हो गये।
एड्स, इनफर्टिलिटी और अन्य बीमारियों की चर्चा करते हुए स्वामी जी ने कहा कि सात प्राणायाम शरीर के सभी अंगों को गतिशील करने में सहायक होते हैं। जब यह अंग पूरी क्षमता के साथ काम करने लगते हैं तो स्वस्थ शरीर का विकास होता है। स्वामी जी ने कहा कि पातांजलि योग पीठ में शोध के सभी संसाधन उपलब्ध कराये जा रहे हैं और उसके बाद भारतीय बच्चों को शोध के लिये विदेश नहीं जाना पडे़गा। विज्ञान का तिरस्कार नहीं बल्कि उसका सत्कार करना चाहिए। विरोध के स्वर भूलकर संवाद, समन्वय और समाधान की ओर आगे बढ़ना चाहिए। आरोग्य मानव मात्र का मौलिक अधिकार है और वह योग के माध्यम से पाया जा सकता है। भारत को विश्व शक्ति बनाने की दिशा में मेरी मुहिम जारी है, जिसमें सफलता मिल रही है। करोड़ों लोग सुबह पांच बजे उठकर बीमारी के खिलाफ जंग लड़ रहे है।
इससे पूर्व स्वामी रामदेव ने रुहेलखंड मेडिकल कालेज का उद्घाटन किया। कालेज के चेयरमैन डा. केशव कुमार ने कहा कि स्वामी जी के आगमन ने कालेज के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है। प्राचार्य डा. कशमीर सिंह ने बताया कि डेंटल कालेज का पहला बैच इसी साल पास-आउट हुआ है। अध्यक्ष अशोक अग्रवाल ने भी विचार रखे। भारतीय दंत चिकित्सा परिषद के अध्यक्ष डा. अनिल कोहली, डा. किरन अग्रवाल, डा. लता अग्रवाल, सर्वेश अग्रवाल, गौरव अग्रवाल, कुलपति ओम प्रकाश आदि ने स्वामी जी का स्वागत किया। साभार
जागरण पोर्टल.

इस बार जमा नहीं करनी पड़ेगी मई-जून की फीस

Mar 30, 02:39 am
बरेली। अगर आपके बच्चे पब्लिक स्कूलों में पढ़ रहे हैं तो यह खबर निश्चित रूप से आपकी जेब के लिए राहत लेकर आई है। इस बार कोई भी स्कूल अभिभावकों से मई और जून के महीने की फीस नहीं वसूल पायेगा। इस मामले में पब्लिक स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए दो-दो अभिभावक संघ मैदान में उतर आये हैं।
प्रदेश भर में पब्लिक स्कूलों की तमाम शिकायतें मिलने के बाद शासन ने पिछले साल किसी भी शिक्षण संस्था के एक महीने या इससे अधिक अवधि तक बंद रहने की स्थिति में फीस वसूले जाने पर रोक लगा दी थी। शासन ने स्पष्ट कहा था कि स्कूल तिमाही या छमाही पैटर्न में फीस नहीं वसूलेंगे। जिन कंधों पर इस आदेश को सख्ती से लागू करवाने की जिम्मेदारी थी, उनकी ढिलाई के चलते इस पर अमल नहीं हो पाया। इसका नतीजा यह है कि अधिकांश स्कूल आदेश जारी होने के एक साल बाद भी तिमाही पैटर्न में ही फीस वसूल रहे हैं।
हालांकि शासन ने ये आदेश पिछले सत्र में ही जारी कर दिये थे लेकिन तब तक अधिकांश स्कूल फीस वसूल चुके थे। पेरेंट्स वेल्फेयर एसोसिएशन के देवेन्द्र जोशी व राजेश साहनी ने कहा- अधिकांश स्कूल अप्रैल में ही अप्रैल, मई व जून की फीस जमा करवा लेते हैं। इस बार हम मई व जून की फीस जमा नहीं होने देंगे। शहनाई बारातघर में हुई एसोसिएशन की बैठक में उत्पीड़न के खिलाफ अभियान छेड़ने का फैसला किया गया।
इधर जिला अभिभावक संघ के संरक्षक अमजद सलीम ने कहा है कि उनका संगठन किसी भी कीमत पर स्कूलों में कापी किताबों के स्टाल नहीं लगने देगा। स्कूलों में स्टाल लगने की सूचना मिलने पर उनका संगठन छापा मारेगा। स्कूल प्रबंधन व पुस्तक विक्रेता की शिकायत शासन और प्रशासन से की जायेगी। साभार
जागरण पोर्टल.

253 परिवार नहीं पिला रहे बच्चों को पोलियो वैक्सीन

Mar 30, 02:39 am
बरेली। पोलियो अभियान की विफलता पर चर्चा होते ही स्वास्थ्य विभाग को सीधा-सीधा कटघरे में खड़ा कर लिया जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि विभागीय स्तर पर कई खामियां है लेकिन अभियान की विफलता के पीछे सच्चाई कुछ और भी है जिससे पर्दा हटना चाहिए। हाई रिस्क एरिया होने के बावजूद बरेली में पिछले कई सालों से 253 परिवार अपने बच्चों को पोलियो वैक्सीन नहीं पिला रहे है। इन बच्चों को अभियान में कवर करने के लिये कोई मशक्कत नहीं की जा रही।
'एक भी बच्चा छूट गया तो संकल्प हमारा टूट गया' पोलियो अभियान को अंजाम तक पहुंचाने के लिये यह जोरशोर से नारा लगाया जाता है, लेकिन इस पर अमल नहीं किया जाता। बरेली में एक नहीं बल्कि हजारों बच्चे हर अभियान में दवा पीने से छूट जाते है। विभागीय आंकड़ों पर ही भरोसा किया जाये तो 253 परिवारों के बच्चों को वैक्सीन नहीं पिलायी जा रही। सालों से इन परिवारों की सूची तैयार की जा रही है लेकिन इन परिवारों के बच्चों को संतृप्त करने के लिये कोई प्रयास नहीं किये जाते। उच्चाधिकारी भी अभियान से पहले दिशा-निर्देश देकर अगले अभियान तक के लिये सब कुछ भूल जाते है।
आइए पहले समझ लेते है कि इस अभियान में कार्यो का बंटवारा किस तरह है। बच्चों को दवा पिलवाने का काम स्वास्थ्य विभाग का है, जबकि डब्ल्यूएचओ सर्विलांस का काम करती है। लकवा से पीडि़त बच्चों को चिन्हित करना और उनके स्टूल का सेम्पुल भरवाने का काम डब्ल्यूएचओ का है। इसमें कोई दो राय नहीं कि डब्ल्यूएचओ का सर्विलांस जबरदस्त तरीके से चल रहा है लेकिन यूनीसेफ सोशल मोबलाइजेशन का काम सिर्फ निपटाने वाले अंदाज में कर रही है।
पोलियो के प्रति प्रचार-प्रसार और विरोधी परिवारों को समझाकर उनके बच्चों को दवा पिलाने के लिये प्रेरित करना यूनीसेफ का काम है। इसके लिये उसके पास पूरी टीम है। बरेली में सौ से अधिक बीएमसी काम कर रहे हैं और उनकी मानीटरिंग के लिये तीन सीएमसी भी तैनात है। विरोधी परिवार वाले क्षेत्रों में जिम्मेदार लोगों से समन्वय बनाकर इन परिवारों को दवा पिलवाने के काम बीएमसी का है लेकिन हकीकत में यह काम ही नहीं कर रहे। वरना सालों से 253 विरोधी परिवारों के आंकड़े में कमी जरूर आती। साभार
जागरण पोर्टल.

आग बुझाने के इंतजाम नाकाफी आबादी बढ़ी पर मानक नहीं

Mar 30, 02:39 am
बरेली। अप्रैल आने में सिर्फ दो दिन बाकी हैं। पिछले रिकार्ड के मुताबिक अग्निकांड के लिहाज से अप्रैल माह सबसे ज्यादा संवेदनशील माना जाता है। गर्मी की धमक शुरू हो गई। पांच-दस दिनों में लू भी चलने लगेगी। खेतों में फसलें तैयार खड़ी हैं। ऐसे में आग की एक चिनगारी भी किसान की पूरी फसल तबाह कर सकती है। ऐसा पिछले वर्षो में होता रहा है। किसान को इस तबाही से बचाने के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं। यानि आग लगी तो बुझेगी भगवान भरोसे ही।
आजादी के बाद जनसंख्या तो कई गुना बढ़ गई, लेकिन आग बुझाने के मानक अभी वही हैं। उस हिसाब से भी साधनों का खासा अभाव हैं।
मानक के अनुसार पांच किमी की परिधि में एक फायर स्टेशन होना चाहिए। मगर जिले भर में केवल तीन अग्निशमन केन्द्र हैं, जिनमें शहर भी शामिल है। शहर के सिविल लाइन स्थित फायर स्टेशन पर तीन गाड़िया हैं। फरीदपुर व बहेड़ी फायर स्टेशन पर सिर्फ एक-एक गाड़ी है। शासन स्तर से परसाखेड़ा अग्निशमन केन्द्र स्वीकृत कर दिया गया है, लेकिन उसे शुरू होने में कई महीनें लग जायेंगे। आंवला व फरीदपुर तहसील में फायर स्टेशन खोलने के लिए शासन को प्रस्ताव भेज दिया गया है, लेकिन स्वीकृति कब मिलेगी इसका पता नहीं। मानक के मुताबिक जिले में तीन अग्निशमन अधिकारी होने चाहिए, जिनमें केवल एक तैनात है। अग्निशमन द्वित अधिकारी पांच की जगह दो ही हैं। फायरमैन आठ कम हैं।
सीएफओ अजय कुमार ने बताया कि मार्च, अप्रैल, मई और जून में आग की घटनायें अधिक होती हैं। पिछले साल अप्रैल में 68, मई 41 व जून में 33 आग लगने की घटनायें हुई। इन दिनों अधिकतर आग खेतों में खड़ी फसलों में लगती है। इसके मद्देनजर लोकल स्तर पर इंतजाम कर लिए गये हैं। नवाबगंज व आंवला थाने में एक-एक फायर जीप व डीजल पम्प की व्यवस्था की गई है। प्रत्येक जगह एक लीडिंग अफसर व दो कर्मचारी तैनात किये गये हैं। इसके अलावा थाना स्तर से भी मदद ले ली जाती है। सिनेमा हाल व पम्पलेट आदि के माध्यम से आग की घटनाओं संबंधी प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।
बावजूद इसके आग के कहर से बच पाना मुश्किल है। मीरगंज तहसील शहर से करीब 30 किमी दूर है। वहां आग बुझाने का कोई भी साधन नहीं। आंवला भी करीब 40 किमी दूर है। ऐसे में कहीं आग लगती है तो वक्त पर फायर ब्रिगेड पहुंच पाना मुश्किल होगा। साभार जागरण पोर्टल.