Sunday, March 30, 2008

253 परिवार नहीं पिला रहे बच्चों को पोलियो वैक्सीन

Mar 30, 02:39 am
बरेली। पोलियो अभियान की विफलता पर चर्चा होते ही स्वास्थ्य विभाग को सीधा-सीधा कटघरे में खड़ा कर लिया जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि विभागीय स्तर पर कई खामियां है लेकिन अभियान की विफलता के पीछे सच्चाई कुछ और भी है जिससे पर्दा हटना चाहिए। हाई रिस्क एरिया होने के बावजूद बरेली में पिछले कई सालों से 253 परिवार अपने बच्चों को पोलियो वैक्सीन नहीं पिला रहे है। इन बच्चों को अभियान में कवर करने के लिये कोई मशक्कत नहीं की जा रही।
'एक भी बच्चा छूट गया तो संकल्प हमारा टूट गया' पोलियो अभियान को अंजाम तक पहुंचाने के लिये यह जोरशोर से नारा लगाया जाता है, लेकिन इस पर अमल नहीं किया जाता। बरेली में एक नहीं बल्कि हजारों बच्चे हर अभियान में दवा पीने से छूट जाते है। विभागीय आंकड़ों पर ही भरोसा किया जाये तो 253 परिवारों के बच्चों को वैक्सीन नहीं पिलायी जा रही। सालों से इन परिवारों की सूची तैयार की जा रही है लेकिन इन परिवारों के बच्चों को संतृप्त करने के लिये कोई प्रयास नहीं किये जाते। उच्चाधिकारी भी अभियान से पहले दिशा-निर्देश देकर अगले अभियान तक के लिये सब कुछ भूल जाते है।
आइए पहले समझ लेते है कि इस अभियान में कार्यो का बंटवारा किस तरह है। बच्चों को दवा पिलवाने का काम स्वास्थ्य विभाग का है, जबकि डब्ल्यूएचओ सर्विलांस का काम करती है। लकवा से पीडि़त बच्चों को चिन्हित करना और उनके स्टूल का सेम्पुल भरवाने का काम डब्ल्यूएचओ का है। इसमें कोई दो राय नहीं कि डब्ल्यूएचओ का सर्विलांस जबरदस्त तरीके से चल रहा है लेकिन यूनीसेफ सोशल मोबलाइजेशन का काम सिर्फ निपटाने वाले अंदाज में कर रही है।
पोलियो के प्रति प्रचार-प्रसार और विरोधी परिवारों को समझाकर उनके बच्चों को दवा पिलाने के लिये प्रेरित करना यूनीसेफ का काम है। इसके लिये उसके पास पूरी टीम है। बरेली में सौ से अधिक बीएमसी काम कर रहे हैं और उनकी मानीटरिंग के लिये तीन सीएमसी भी तैनात है। विरोधी परिवार वाले क्षेत्रों में जिम्मेदार लोगों से समन्वय बनाकर इन परिवारों को दवा पिलवाने के काम बीएमसी का है लेकिन हकीकत में यह काम ही नहीं कर रहे। वरना सालों से 253 विरोधी परिवारों के आंकड़े में कमी जरूर आती। साभार
जागरण पोर्टल.

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