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Monday, October 23, 2017

बरेली का ऐतिहासिक रंगमंच

आप ने अपने बचपन मे मंडली, खेल, नाटक कंपनी ज़रूर सुनी देखी होगी। आज हम जिसे रंगमंच के नाम से जानते हैं ये वोही है।
बरेली देश के उन गिने चुने शहरों में से एक है जिसने रंगमंच का इतिहास रचा और उसके तीन दौर देखे हैं। #पहला दौर जब पारसी थिएटर शुरू हुआ जब शेक्सपियर के नाटकों का मंचन होता था और फिर 1847 में बरेली के मौलवी करीमुद्दीन ने इसे भारतीय रूप दिया। उन्होंने भारतीय जनमानस में लोकप्रिय दास्तानों से नाटकों का रूप दिया और उनका मंचन किया। ये दौर चलता हुआ जब #दूसरे दौर में प्रवेश कर गया तो बरेली के पंडित राधेश्याम कथावाचक का दौर आया जब 1876 में उनके लिखे उर्दू नाटक 'मशरिकी हर' ने धूम मचा दी। धीरे धीरे ये दौर दास्तानों से होता हुआ पौराणिक कथाओं में दाखिल हुआ और फिर रंगमंच का रूप रसिया ढोला आदि ने लेना शुरू किया। खास तौर पर लोक संस्कृति ने रंगमंच को अपने ढंग से अपना लिया। त्यौहारों के अवसर पर शाम ढले गाँवों की चौपालों पर इनका प्रस्तुतीकरण किया जाता। इन नाटिकाओं के केन्द्रों में बिथरी चैनपुर, भोजीपुरा तथा पश्चिमी फतेहगंज के कुछ गाँव (सभी बरेली के निकट स्थित) हैं। "रसिया और ढोला" के कलाकारों मे माया देवी इलाहाबादी (शाहजहाँपुर), डोरी लाल तथा पप्पू (बिथरी चैनपुरी निवासी), जामन लाल तथा लक्ष्मी नारायण (ग्राम - क्यारा, निकट बरेली) का नाम आता है। जिनके नाटक सुल्ताना डाकू, नरसी का भात, आल्हा ऊदल, मरु का गौना आदि हैं। वर्तमान में बरेली पुनः #तीसरे दौर में प्रवेश कर चुकी है जिसमे अब बरेली अंतराष्टीय नाट्य महोत्सव और windermere नामक थिएटर हाल में नाटकों का सफल संचालन हो रहा है।
©रबीअ बहार